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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
तान्दृष्ट्वा पततः शीघ्रं द्रोणचापच्युताञ्शरान् |  १०   क
अवारय़च्छरैरेव तावद्भिर्निशितैर्दृढैः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति