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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
तं द्रोणो द्विपदां श्रेष्ठो नाराचेन समर्पय़त् |  १५   क
स तस्य कवचं भित्त्वा प्राविशद्धरणीतलम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति