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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
सोऽतिविद्धो महाराज द्रोणेनास्त्रविदा भृशम् |  १७   क
क्रोधेन महताविष्टो व्यावृत्य नय़ने शुभे ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति