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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु वहुधा विद्धो वृहत्क्षत्रेण मारिष |  १९   क
असृजद्विशिखांस्तीक्ष्णान्केकय़स्य रथं प्रति ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति