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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
सारथे याहि यत्रैष द्रोणस्तिष्ठति दंशितः |  २३   क
विनिघ्नन्केकय़ान्सर्वान्पाञ्चालानां च वाहिनीम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति