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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
तामापतन्तीं सहसा घोररूपां भय़ावहाम् |  ३१   क
अश्मसारमय़ीं गुर्वीं तपनीय़विभूषिताम् |  ३१   ख
शरैरनेकसाहस्रैर्भारद्वाजो न्यपातय़त् ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति