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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
स तस्य कवचं भित्त्वा हृदय़ं चामितौजसः |  ३६   क
अभ्यगाद्धरणीं वाणो हंसः पद्मसरो यथा ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति