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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
पतङ्गं हि ग्रसेच्चाषो यथा राजन्वुभुक्षितः |  ३७   क
तथा द्रोणोऽग्रसच्छूरो धृष्टकेतुं महामृधे ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति