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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
तेषु प्रक्षीय़माणेषु पाण्डवेय़ेषु भारत |  ४०   क
जरासन्धसुतो वीरः स्वय़ं द्रोणमुपाद्रवत् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति