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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
स तु द्रोणं महाराज छादय़न्साय़कैः शितैः |  ४१   क
अदृश्यमकरोत्तूर्णं जलदो भास्करं यथा ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति