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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
तस्य तल्लाघवं दृष्ट्वा द्रोणः क्षत्रिय़मर्दनः |  ४२   क
व्यसृजत्साय़कांस्तूर्णं शतशोऽथ सहस्रशः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति