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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
छादय़ित्वा रणे द्रोणो रथस्थं रथिनां वरम् |  ४३   क
जारासन्धिमथो जघ्ने मिषतां सर्वधन्विनाम् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति