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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
ततो द्रोणो महेष्वासो नाम विश्राव्य संय़ुगे |  ४५   क
शरैरनेकसाहस्रैः पाण्डवेय़ान्व्यमोहय़त् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति