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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
ततो द्रोणाङ्किता वाणाः स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः |  ४६   क
नरान्नागान्हय़ांश्चैव निजघ्नुः सर्वतो रणे ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति