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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
हत द्रोणं हत द्रोणमिति ते द्रोणमभ्ययुः |  ५१   क
यतन्तः पुरुषव्याघ्राः सर्वशक्त्या महाद्युतिम् |  ५१   ख
निनीषन्तो रणे द्रोणं यमस्य सदनं प्रति ||  ५१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति