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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
व्राह्मणेन तपो नूनं चरितं दुश्चरं महत् |  ५५   क
तथा हि युधि विक्रान्तो दहति क्षत्रिय़र्षभान् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति