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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
धर्मो युद्धं क्षत्रिय़स्य व्राह्मणस्य परं तपः |  ५६   क
तपस्वी कृतविद्यश्च प्रेक्षितेनापि निर्दहेत् ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति