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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणास्त्रमग्निसंस्पर्शं प्रविष्टाः क्षत्रिय़र्षभाः |  ५७   क
वहवो दुस्तरं घोरं यत्रादह्यन्त भारत ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति