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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
अकालवर्षी च तदा भविष्यति सहस्रदृक् |  ७६   क
सस्यानि च न रोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ||  ७६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति