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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
स द्रोणं दशभिर्वाणैः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे |  ६४   क
चतुर्भिः सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति