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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
चेकितानरथं दृष्ट्वा विद्रुतं हतसारथिम् |  ६७   क
पाञ्चालान्पाण्डवांश्चैव महद्भय़मथाविशत् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति