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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
तान्समेतान्रणे शूरांश्चेदिपाञ्चालसृञ्जय़ान् |  ६८   क
समन्ताद्द्रावय़न्द्रोणो वह्वशोभत मारिष ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति