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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
शतशः शेरते भूमौ निकृत्ता गोवृषा इव |  ७३   क
रुधिरेण परीताङ्गाः श्वसृगालादनीकृताः ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति