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आदि पर्व
अध्याय १०२
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वैशम्पाय़न उवाच
गृहेषु कुरुमुख्यानां पौराणां च नराधिप |  १४   क
दीय़तां भुज्यतां चेति वाचोऽश्रूय़न्त सर्वशः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति