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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
सोऽसृजद्वाय़ुमग्निं च भास्करं चापि वीर्यवान् |  १३   क
आकाशमसृजच्चोर्ध्वमधो भूमिं च नैरृतिम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति