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अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
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अगस्त्य उवाच
कथमेष मय़ा शक्यः शप्तुं यस्य महामुने |  १६   क
वरदेन वरो दत्तो भवतो विदितश्च सः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति