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अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
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अगस्त्य उवाच
यो मे दृष्टिपथं गच्छेत्स मे वश्यो भवेदिति |  १७   क
इत्यनेन वरो देवाद्याचितो गच्छता दिवम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति