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अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
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युधिष्ठिर उवाच
धूपप्रदानस्य फलं प्रदीपस्य तथैव च |  २   क
वलय़श्च किमर्थं वै क्षिप्यन्ते गृहमेधिभिः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति