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अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
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अगस्त्य उवाच
प्राय़च्छत वरं देवः प्रजानां दुःखकारकम् |  २०   क
द्विजेष्वधर्मय़ुक्तानि स करोति नराधमः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति