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अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
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भृगुरु उवाच
अद्य हि त्वा सुदुर्वुद्धी रथे योक्ष्यति देवराट् |  २३   क
अद्यैनमहमुद्वृत्तं करिष्येऽनिन्द्रमोजसा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति