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अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
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भृगुरु उवाच
अद्येन्द्रं स्थापय़िष्यामि पश्यतस्ते शतक्रतुम् |  २४   क
सञ्चाल्य पापकर्माणमिन्द्रस्थानात्सुदुर्मतिम् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति