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अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
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भृगुरु उवाच
अद्य चासौ कुदेवेन्द्रस्त्वां पदा धर्षय़िष्यति |  २५   क
दैवोपहतचित्तत्वादात्मनाशाय़ मन्दधीः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति