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अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
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भृगुरु उवाच
नहुषं पापकर्माणमैश्वर्यवलमोहितम् |  २८   क
यथा च रोचते तुभ्यं तथा कर्तास्म्यहं मुने ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति