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शान्ति पर्व
अध्याय २८४
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पराशर उवाच
एष धर्मविधिस्तात गृहस्थस्य प्रकीर्तितः |  १   क
तपोविधिं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति