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अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
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भीष्म उवाच
तत्रापि प्रय़तो राजन्नहुषस्त्रिदिवे वसन् |  ५   क
मानुषीश्चैव दिव्याश्च कुर्वाणो विविधाः क्रिय़ाः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति