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अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
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उमो उवाच
ऋषिधर्मं तु धर्मज्ञ श्रोतुमिच्छाम्यनुत्तमम् |  ३२   क
स्पृहा भवति मे नित्यं तपोवननिवासिषु ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति