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वन पर्व
अध्याय १०२
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लोमश उवाच
त्रिदशानां वचः श्रुत्वा तथेति मुनिरव्रवीत् |  १८   क
करिष्ये भवतां कामं लोकानां च महत्सुखम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति