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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
एष ते विहितः पार्थ घोरो धर्मो दुरन्वय़ः |  ५०   क
तं स्वधर्मविभागेन विनय़स्थोऽनुपालय़ ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति