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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
स मुक्तो हर्म्यशिखरात्तस्मात्पुनरवापतत् |  २१   क
लङ्घय़ित्वा पुरीं लङ्कां स्ववलस्य समीपतः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति