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भीष्म पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
निर्मनुष्यान्रथान्राजन्गजानश्वांश्च संय़ुगे |  १३   क
अकरोत्स महावाहुः सर्वशस्त्रभृतां वरः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति