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अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
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वासुदेव उवाच
विग्रहं पूजय़ेद्यो वै लिङ्गं वापि महात्मनः |  १६   क
लिङ्गं पूजय़िता नित्यं महतीं श्रिय़मश्नुते ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति