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भीष्म पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
प्रभज्यमानं सैन्यं तु दृष्ट्वा यादवनन्दनः |  ३०   क
उवाच पार्थं वीभत्सुं निगृह्य रथमुत्तमम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति