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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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राजो उवाच
अज्ञातमस्य धर्मस्य फलं मे किं करिष्यति |  ५२   क
प्राप्नोतु तत्फलं विप्रो नाहमिच्छे ससंशय़म् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति