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वन पर्व
अध्याय २१५
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मार्कण्डेय़ उवाच
ऊचुश्चापि त्वमस्माकं पुत्रोऽस्माभिर्धृतं जगत् |  १८   क
अभिनन्दस्व नः सर्वाः प्रस्नुताः स्नेहविक्लवाः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति