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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
पूजय़ेद्विग्रहं यस्तु लिङ्गं वापि समर्चय़ेत् |  ९४   क
लिङ्गं पूजय़िता नित्यं महतीं श्रिय़मश्नुते ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति