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भीष्म पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य रजतप्रख्यान्हय़ान्पार्थस्य मारिष |  ५३   क
क्रुद्धो नाम महाय़ोगी प्रचस्कन्द महारथात् |  ५३   ख
अभिदुद्राव भीष्मं स भुजप्रहरणो वली ||  ५३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति