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भीष्म पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
प्रतोदपाणिस्तेजस्वी सिंहवद्विनदन्मुहुः |  ५४   क
दारय़न्निव पद्भ्यां स जगतीं जगतीश्वरः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति