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भीष्म पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
त्वय़ा हि देव सङ्ग्रामे हतस्यापि ममानघ |  ६१   क
श्रेय़ एव परं कृष्ण लोकेऽमुष्मिन्निहैव च |  ६१   ख
सम्भावितोऽस्मि गोविन्द त्रैलोक्येनाद्य संय़ुगे ||  ६१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति