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अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
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भीष्म उवाच
श्रान्तावपि हि कृच्छ्रेण रथमेतं समूहतुः |  ४७   क
न चैतय़ोर्विकारं वै ददर्श भृगुनन्दनः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति