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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
अथान्यं रथमास्थाय़ धर्मराजो युधिष्ठिरः |  २३   क
शकुनिं नवभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः |  २३   ख
ननाद च महानादं प्रवरः सर्वधन्विनाम् ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति